मेंथा / पिपरमेंट की खेती की जानकारी | जाने मेंथा की खेती कैसे करें.

मेंथा पिपरमेंट की खेती की जानकारी जाने मेंथा की खेती कैसे करें

आज हम बात करते हैं मेंथा की खेती की। सभी किसान भाई जानते हैं कि केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के प्रयास में है। इसके लिए सरकार समय-समय पर कर्जमाफी, ऋण योजनाएं, सस्ते खाद-बीज आदि जैसे कई उपाय कर रही है। समय के साथ-साथ किसान भी जागरूक हुए हैं और अब परंपरागत फसलों के स्थान पर नकदी की फसल को भी प्रमुखता देने लगे हैं।

मेंथा / पिपरमेंट की खेती की पूरी जानकारी

मेंथा

मेंथा को मिंट, पिपरमेंट व पौदीना के नाम से भी जाना जाता है।

मेंथा की खेती का सही समय

यूपी समेत देश के कई हिस्सों में फरवरी से लेकर अप्रैल मध्य तक इसकी रोपाई होती है। 15 जनवरी से 15 फरवरी तक मेंथा की फसल का सबसे अधिक उपयुक्त समय होता है। इस समय रोपी गई फसल में अधिक तेल निकलता है। विश्व में सबसे अधिक मेंथा का उत्पादन भारत में होता है। देश के पश्चिमी यूपी के कई जिलों का मेंथा के उत्पादन में एकाधिकार है और यूपी के किसानों ने मेंंथा की रोपाई शुरू कर दी है। देरी से बुवाई हेतु पौधों को नर्सरी में तैयार करके मार्च से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक खेत में पौधों की रोपाई अवश्य कर देना चाहिए। विलंब से मेंथा की खेती के लिए कोसी प्रजाति का उचित चुनाव करें।

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मेंथा ऑयल – किसान कमा रहे है दोगुना मुनाफा.

चालू सीजन यानी 2019-20 सीजन (जून-मई) में मेंथा ऑयल का उत्पादन काफी ज्यादा रहा। बाजार के सूत्रों का कहना है कि 2019-20 में उत्पादन लगभग 48,000-50,000 टन मेंथा ऑयल का उत्पादन हुआ था। देश में पैदा होने वाला लगभग 75 फीसदी मेंथा ऑयल का निर्यात किया जाता है। इसलिए घरेलू से ज्यादा विदेशी मांग कीमतों को तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है। वर्तमान में मेंथा ऑयल के भाव 1200 से 1400 रुपए प्रति किलो के बीच चल रहे हैं। जो कि उत्पादन लागत के दोगुना से अधिक है।

मेंथा / पिपरमेंट की खेती के तरीके

मेन्था की जड़ों को पौधशाला में लगाने का समय

मेन्था की जड़ों की बुवाई अगस्त माह में नर्सरी में कर देते हैं। नर्सरी को ऊँचे स्थान में बनाते है ताकि इसे जलभराव से रोका जा सके। अधिक वर्षा हो जाने पर जल का निकास करना चाहिए।

ऐसे तैयार करें खेत

मेंथा की खेती के लिए पूरी तरह से पर्याप्त जीवांश अच्छी जल निकास वाली पीएच मान 6 से 7.5 वाली दोमट और मटियारी दोमट मिट्टी सबसे ज्यादा उपयुक्त रहती है। मेंथा की खेती के लिए भूमि की अच्छी तरह से जुताई की जानी चाहिए और उसके बाद उसको समतल बना देते है।

मेंथा की नर्सरी तैयार करने की विधि

मेंथा की रोपाई के लिए नर्सरी और जड़ों, दोनों को ही प्रयोग में लाते हैं, लेकिन जो पैदावार नर्सरी से प्राप्त होती है, वो जड़ों को बोने की अपेक्षा अधिक मात्रा में होती है । नर्सरी के लिए एक थोड़े से स्थान पर खेत को तैयार कर क्यारियां बना लेते हैं और उसमें जड़ों को काफी घनी मात्रा में लगाकर सिंचाई करते रहते हैं। इस प्रकार उन जड़ों से निकलने वाले कल्ले तैयार होते हैं, जो रोपाई के लिए काम आते हैं।

खेत में मेंथा को केसे लगाए

मेंथा को कतार में लगाना चाहिए। लाइन से लाइन के बीच की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे के बीच की दूरी 15 सेंटीमीटर होनी चाहिए। लेकिन अगर यही रोपाई गेहूं को काटने के बाद लगानी है तो लाइन से लाइन की बीच की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे के बीच की दूरी लगभग 10 सेंटीमीटर होनी चाहिए।

मेंथा की खेती की तकनीक

अगर आपको मेंथा की बुवाई करनी है तो जापानी मेंथा के लिए रोपाई से लाइन की दूरी 30-40 सेमी, देसी 45-60 सेमी, और जापानी मेंथा की बुवाई के बीच की दूरी 15 सेमी रखनी चाहिए। जड़ों की रोपाई 3 से 5 सेमी गहराई में करें। कोशिश करें कि रोपाई के तुरंत बाद हल्की सी सिंचाई भी कर दें। बुवाई और रोपाई हेतु 4-5 कुन्तलों जड़ों के 8 से 10 सेमी टुकड़ें उपयुक्त होते है।

मेंथा बढ़ाने की तकनीक

मेंथा की सिंचाई भूमि की किस्म और तापमान पर और हवाओं पर निर्भर करती है। इसके पश्चात 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए और कटाई करने के बाद सिंचाई करना आवश्यक है।

मेंथा की खेती में खरपतवार नियंत्रणखरपतवार नियंत्रण रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेंथलीन 30 ईसी के 3.3 प्रति लीटर हेक्टेयर को 700-800 लीटर पानी में घोलकर बुवाई और रोपाई के पश्चात ओट आने पर यथाशीघ्र छिडक़ाव करें।

मेंथा प्रमुख कीट, रोग

दीमक

दीमक मेंथा की जड़ों को क्षति पहुंचाती है, फलस्वरूप जमाव पर काफी बुरा असर डालता है। इनके प्रकोप से पौधे पूरी तरह से सूख जाते है। खड़ी फसल में क्लोरापाइरीफास 2.5 प्रति लीटर हेक्टेयर की दर से सिंचाई के साथ प्रयोग करें।

पत्ती लेपटक कीट

इसकी सूडियां पत्तियों को लेपेटते हुए खाती है। इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्राटफास 36 ईसी 10 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 700 लीटर पानी में घोल कर छिडक़ाव करें।

पर्णदाग

इस तरह के बीमारी में पत्तियों पर हरे भूरे रंग के दाग पड़ जाते है। इससे पत्तियां पीली पडक़र अपने आप गिरने लगती है. इसके रोग के निदान के लिए मैंकोजोब 75 पी डब्लयूपी नामक फफूंदीनाशक की 2 किलोग्राम 600 से 800 लीटर में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडक़ाव करें।

मेंथा की कटाई का सही समय

मेंथा के फसल की कटाई प्राय: दो बार की जाती है। पहली कटाई के लगभग 100 से 120 दिन पर जब पौधों में कलियां आने लगती है। पौधों की सतह से कटाई जमीन की सतह से 4 से 5 सेमी की ऊंचाई पर की जानी चाहिए। दूसरी कटाई को 70 से 80 दिनों के बाद ही करें। बाद में कटाई के बाद पौधों को 2 से 3 घंटे खुली हुई धूप में छोड़ दें और बाद में कटी फसल को छाया में हल्का सुखाकर जलदी से आसवन विधि यंत्र द्वारा तेल से निकाल लेंञ दो कटाई में लगभग आपको 250 से 300 क्विंटल या 125-150 किग्रा तेल प्रति हेक्टेसी की दर से प्राप्त होगा।

मेंथा के उपयोग

मेंथा का प्रयोग कई तरह के औषधीय गुणों में किया जाता है। इसका प्रयोग बड़ी मात्रा में दवाईयों, पान मसाला खुशबू, पेय पदार्थों, सिगरेट आदि के प्रयोग में किया जाता है। साथ ही मेंथा और यूकेलिप्टस के तेल से कई तरह के रोगों के निवारण की दवाई भी बनाई जाती है। इसके अलावा गठिया के निवारण हेतु इन दवाईयों का सबसे ज्यादा उपयोग किया जाता है।

मेंथा से ज्यादा मुनाफा कैसे पाए

एक हेक्टेयर मेंथा की फसल से लगभग 150 किलो तेल प्राप्त हो जाता है यदि अच्छे से प्रबंधन किया जाए और समय से रोपाई हुई हो तो 200 से 250 किलो तेल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है।

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